Uttarakhand : न्यायाधीश दीपाली शर्मा को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, जानिए क्या है पूरा मामला

Edited By Vandana Khosla, Updated: 10 Jan, 2026 08:56 AM

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नैनीतालः उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दीवानी अदालत की न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) दीपाली शर्मा की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उन्हें सेवा की निरंतरता और वरिष्ठता के साथ बहाल करने का आदेश दिया है । अदालत ने निर्देश दिया कि यह माना जाएगा कि उन्हें कभी...

नैनीतालः उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दीवानी अदालत की न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) दीपाली शर्मा की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उन्हें सेवा की निरंतरता और वरिष्ठता के साथ बहाल करने का आदेश दिया है । अदालत ने निर्देश दिया कि यह माना जाएगा कि उन्हें कभी सेवा से नहीं हटाया गया था और वह इस बीच की अवधि के लिए बकाया लाभों के 50 फीसदी की हकदार होगी तथा इससे उनकी वरिष्ठता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

गौरतलब हो कि 2018 में एक गुमनाम शिकायत में आरोप लगाया गया था कि हरिद्वार में दीवानी अदालत की न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) के रूप में अपनी तैनाती के दौरान शर्मा ने 14 वर्षीय एक लड़की को अपने घर में रखा, उससे घरेलू काम करवाया, उसके स्वास्थ्य की उपेक्षा की और उसे शारीरिक नुकसान पहुंचाया। इसके बाद मामले की जांच की गई और उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने शर्मा की सेवाएं समाप्त करने का फैसला सुनाया। बाद में इस संबंध में एक शासनादेश जारी किया गया था ।

नौ न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ के आदेश तथा उसके बाद जारी शासनादेश को नवंबर 2020 में उच्च न्यायालय के सामने चुनौती दी गयी। इसके बाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले के सभी रिकॉर्ड का परीक्षण किया और जांच में महत्वपूर्ण खामियां पाई। अदालत ने पाया कि मामले की मुख्य गवाह लड़की और उसके पिता दोनों ने शर्मा के खिलाफ सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि उन्होंने लड़की के साथ उचित व्यवहार किया था ।

अदालत ने यह भी पाया कि हरिद्वार की जजेज कॉलोनी में शर्मा के आधिकारिक आवास पर 2018 में की गई छापेमारी के लिए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के.एम. जोसेफ से कोई पूर्व स्वीकृति प्राप्त नहीं की गई थी और आस-पास कई न्यायाधीशों के रहने के बावजूद कोई भी गवाह यह बताने के लिए आगे नहीं आया कि वहां कोई कदाचार हुआ था। खंडपीठ ने एक महिला न्यायिक अधिकारी के आवास पर छापा मारने के लिए 18-20 अधिकारियों की टीम तैनात करने की जरूरत पर भी पर सवाल उठाया ।

दीपाली शर्मा के खिलाफ शिकायत में घरेलू सहायिका के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगाया गया था। अदालत ने पाया कि शर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोप नाबालिग लड़की को रखने या बाल श्रम कराने से संबंधित नहीं थे बल्कि ये आरोप उत्तराखंड सरकारी कर्मचारी नियम, 2002 के तहत उनकी ईमानदारी और कार्य आचरण से संबंधित थे और घरेलू काम के लिए बच्चों को नियुक्त करने से संबंधित नियम लागू नहीं किए गए थे।

उच्च न्यायालय ने इन्हीं आधार पर 14 अक्टूबर 2020 के अदालत के प्रस्ताव और उसके बाद जारी बर्खास्तगी के शासनादेश को रद्द कर दिया और दीपाली शर्मा को पूर्ण वरिष्ठता एवं आंशिक सेवा लाभों के साथ पद पर बहाल कर दिया।

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