Edited By Vandana Khosla, Updated: 22 Jan, 2026 02:18 PM

नैनीतालः उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने नैनीताल जिले की मुखानी पुलिस चौकी पर तैनात कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह की हत्या के दोषी राजेंद्र कुमार आर्य की आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 'जेल में पहले ही बिताई जा चुकी अवधि' तक कर दिया है। अदालत ने इस मामले को...
नैनीतालः उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने नैनीताल जिले की मुखानी पुलिस चौकी पर तैनात कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह की हत्या के दोषी राजेंद्र कुमार आर्य की आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 'जेल में पहले ही बिताई जा चुकी अवधि' तक कर दिया है। अदालत ने इस मामले को हत्या की धारा 302 के बजाय हत्या की धारा 304 के तहत गैर इरादतन हत्या मानते हुए कहा कि आरोपी को केवल उतने समय के लिए दंडित किया जाना चाहिए जो वह पहले ही जेल में बिता चुका है। आर्य, मई 2014 से लगभग 11 वर्षों से जेल में है। इस मामले की सुनवाई करने वाली न्यायमूर्ति रविंद्र मैंठाणी और न्यायमूर्ति आलोक माहरा की अवकाशकालीन पीठ ने आर्य की तत्काल रिहाई के आदेश दिए।
इस मामले के अनुसार, 28 मई 2014 को आर्य को चोरी के एक मामले में हल्द्वानी के मुखानी पुलिस चौकी में हिरासत में लिया गया था। पुलिस के अनुसार, सुबह होने से पहले आर्य ने हिरासत से भागने की कोशिश की और जब ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह ने उसे रोकने की कोशिश की, तो आर्य ने वहीं पड़ी लोहे की एक छड़ से उनकी छाती पर वार कर दिया। गंभीर चोट के कारण कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई। वर्ष 2017 में, हल्द्वानी स्थित प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने राजेंद्र कुमार आर्य को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास और हिरासत से भागने की कोशिश के लिए दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। आरोपी ने इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
पुलिस ने दावा किया था कि आरोपी ने हथकड़ी खोलने के बाद भागने की कोशिश की, लेकिन उच्च न्यायालय ने इस पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा कि पुलिस यह साबित करने में विफल रही है कि आरोपी को चाबियां कहां से मिलीं। अदालत का मानना था कि शायद आरोपी को हथकड़ी नहीं लगाई गई थी। उच्च न्यायालय ने माना कि हत्या पूर्व नियोजित नहीं थी। आरोपी केवल भागने की कोशिश कर रहा था और हाथापाई के दौरान उसने पास में पड़ी एक छड़ उठाकर कांस्टेबल पर वार कर दिया।
न्यायालय ने कहा कि यह मामला अचानक हुए झगड़े के दौरान हुई घटना की श्रेणी में आता है। इसी के अनुरूप, न्यायालय ने दोषसिद्धि को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 से बदलकर धारा 304 कर दिया। चूंकि आरोपी 28 मई 2014 से लगातार जेल में है, इसलिए न्यायालय ने उसे जेल में बिता चुके समय के बराबर सजा सुनाई। उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा कर दिया जाए। आर्य पर निचली अदालत द्वारा लगाया गया जुर्माना बरकरार रखा गया है।