Phool Dei Festival 2026: कल मनाया जाएगा फूलदेई का पर्व, बच्चों के गीतों और फूलों से सजेगी देहरी

Edited By SHUKDEV PRASAD, Updated: 14 Mar, 2026 06:11 PM

phool dei festival 2026

भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में क्षेत्रीय त्योहारों का अपना खास महत्व है। इन्हीं खास पर्वों में से एक है फूलदेई (Phool Dei), जिसे उत्तराखंड में बड़े उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

नेशनल डेस्क: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में क्षेत्रीय त्योहारों का अपना खास महत्व है। इन्हीं खास पर्वों में से एक है फूलदेई (Phool Dei), जिसे उत्तराखंड में बड़े उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व खास तौर पर पहाड़ी क्षेत्रों की लोकसंस्कृति और प्रकृति से जुड़ा हुआ है।

साल 2026 में फूलदेई का त्योहार 15 मार्च (रविवार) को मनाया जाएगा। यह दिन Meena Sankranti या चैत्र संक्रांति के रूप में भी जाना जाता है और पर्वतीय इलाकों में इसे नए साल की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इस मौके पर पहाड़ों में वसंत ऋतु का स्वागत किया जाता है, जब चारों ओर हरियाली, नए पत्ते और रंग-बिरंगे फूलों से प्रकृति खिल उठती है।

बच्चों का खास पर्व है फूलदेई

फूलदेई को खासतौर पर बच्चों का त्योहार कहा जाता है। इस दिन सुबह-सुबह बच्चे आसपास के जंगलों और बगीचों से ताजे और रंगीन फूल इकट्ठा करते हैं। इसके बाद वे गांव के घरों में जाकर दरवाजों की देहरी पर फूल अर्पित करते हैं और पारंपरिक लोकगीत गाते हैं। इस दौरान बच्चे खुशहाली और समृद्धि की कामना करते हुए गीत गाते हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपरा का हिस्सा हैं।

देहरी पर फूल चढ़ाने की अनोखी परंपरा

फूलदेई पर्व में बच्चे घर की देहरी पर फूल सजाकर शुभकामनाएं देते हैं। लोकमान्यता के अनुसार यह परंपरा घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली लाने का प्रतीक मानी जाती है। बच्चों के गीत और फूलों की खुशबू पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल बना देती है। इस दौरान घर के लोग बच्चों को आशीर्वाद स्वरूप चावल, गुड़, मिठाई, सिक्के या अन्य उपहार देते हैं।

प्रकृति और नई शुरुआत का संदेश

फूलदेई पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। यह पर्व वसंत ऋतु के आगमन, नई ऊर्जा और सकारात्मक शुरुआत का संदेश देता है। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में यह दिन खास उल्लास के साथ मनाया जाता है, जहां फूलों की खुशबू, बच्चों के गीत और लोक परंपराएं पूरे वातावरण को आनंदमय बना देती हैं।

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